ऑटो इंडस्ट्री में हलचल: फॉक्सवैगन की बड़ी छंटनी की चर्चा तेज
बर्लिन: जर्मनी की मशहूर कार निर्माता कंपनी फॉक्सवैगन इस समय अपने 89 साल के इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। खबरों के मुताबिक, कंपनी बड़े पैमाने पर छंटनी करने की तैयारी में है, जिससे करीब एक लाख कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है। इस बड़े फैसले के तहत फॉक्सवैगन अपने चार बड़े फैक्टरी प्लांट भी बंद कर सकती है। दुनिया की सबसे बड़ी ऑटो कंपनियों में शुमार फॉक्सवैगन के इस कदम को ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
क्यों बंद हो रहे हैं प्लांट और क्यों जा रही हैं नौकरियां?
फॉक्सवैगन की इस हालत के पीछे कई बड़ी वजहें हैं। सबसे बड़ा कारण यूरोप के बाजारों में कारों की मांग का लगातार कम होना है। इसके साथ ही अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे भारी टैरिफ (टैक्स) ने भी कंपनी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती चीन से मिल रही है। कभी यूरोप और चीन के बाजारों में राज करने वाली फॉक्सवैगन को अब चीनी कार कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल रही है। चीनी कंपनियां कम कीमत में बेहतरीन टेक्नोलॉजी और शानदार इलेक्ट्रिक कारें बाजार में उतार रही हैं, जिससे फॉक्सवैगन की बिक्री पर बहुत बुरा असर पड़ा है।
किन फैक्ट्रियों पर लटकी है बंदी की तलवार?
कंपनी के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, जिन चार बड़े प्लांट को बंद करने की योजना बनाई गई है, उनमें हनोवर, ज्विकौ, एम्डेन और ऑडी का नेकार्सुल्म प्लांट शामिल हैं। इन प्लांट्स को बंद करने के प्रस्ताव पर जुलाई के महीने में होने वाली बोर्ड मीटिंग में अंतिम चर्चा की जा सकती है। अगर इस योजना को मंजूरी मिल जाती है, तो सीधे तौर पर लगभग 45 हजार लोगों की नौकरियां चली जाएंगी। इसके अलावा, लगभग 50 हजार कर्मचारियों को कम करने के लिए कंपनी पहले ही यूनियन से बातचीत कर चुकी है, जिससे प्रभावित होने वाले कुल लोगों की संख्या एक लाख तक पहुंच सकती है।
चीनी बाजार में खोया अपना पुराना दबदबा
एक समय था जब फॉक्सवैगन चीन के बाजार में सबसे ज्यादा कारें बेचने वाली कंपनी हुआ करती थी, लेकिन वहां की स्थानीय कंपनी बीवाईडी (BYD) ने फॉक्सवैगन को पछाड़कर नंबर वन का स्थान हासिल कर लिया है। चीन के बाजार में अब विदेशी कार कंपनियों का क्रेज तेजी से घट रहा है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में चीनी मार्केट में गैर-चीनी कार कंपनियों की हिस्सेदारी 57 फीसदी थी, जो अब घटकर महज 32 फीसदी रह गई है। इसी का नतीजा है कि फॉक्सवैगन जैसी दिग्गज कंपनी को आज इतने कड़े और नुकसानदेह फैसले लेने पड़ रहे हैं।

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