अमेरिकी नाकाबंदी हटते ही ईरान का बड़ा फैसला, समुद्री जहाजों के लिए बदले नियम
तेहरान। वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान ने एक बहुत बड़ा नीतिगत परिवर्तन किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के मध्य संपन्न हुए 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) के आलोक में अब किसी भी वाणिज्यिक पोत या जहाज को इस जलमार्ग से सीधे गुजरने की स्वतंत्रता नहीं होगी। ईरान सरकार द्वारा लागू की गई नई विनियामक व्यवस्था के अंतर्गत अब केवल उन्हीं जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से आवागमन की अनुमति मिलेगी जो पूर्व में इसके लिए औपचारिक आवेदन करेंगे और निर्धारित दिशा-निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन करेंगे। चूंकि वैश्विक स्तर पर कुल कच्चे तेल और एलएनजी के लगभग पांचवें हिस्से का परिवहन इसी संकीर्ण मार्ग से होता है, इसलिए ईरान के इस रणनीतिक कदम को अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
परमिट आधारित नई व्यवस्था और कड़े सुरक्षा नियम
इस ऐतिहासिक बदलाव से पूर्व होर्मुज जलडमरूमध्य से पारगमन के लिए किसी विशेष प्रशासनिक परमिशन की आवश्यकता नहीं होती थी और जहाज अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों के अनुरूप यहां से गुजरते थे। हालांकि, अब ईरान ने 'पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी' (पीजीएसए) नामक एक नई नोडल एजेंसी का गठन कर संपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह से बदल दिया है। नए नियमों के तहत प्रत्येक जहाज को होर्मुज क्षेत्र में प्रवेश करने से कम से कम 48 घंटे पहले ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रस्तुत करना होगा। इस डिजिटल आवेदन में जहाज का नाम, पंजीकृत ध्वज, आईएमओ नंबर, कार्गो (सामान) की विस्तृत प्रकृति, स्वामित्व का विवरण, बीमा प्रपत्र और चालक दल के सदस्यों की राष्ट्रीयता जैसी अत्यंत गोपनीय जानकारियां साझा करनी होंगी। यदि कोई भी दस्तावेज या सूचना अपूर्ण पाई जाती है, तो पीजीएसए को आवेदन लंबित रखने या उसे पूरी तरह से निरस्त करने का सर्वाधिकार होगा।
सीमित वैधता, निर्धारित समुद्री मार्ग और बीमा के नए प्रावधान
ईरान की नई एजेंसी द्वारा आवेदन स्वीकृत किए जाने के उपरांत जहाजों को एक विशिष्ट पारगमन परमिट जारी किया जाएगा, जो केवल एक बार की यात्रा के लिए और अधिकतम पांच दिनों तक ही वैध रहेगा। समय सीमा समाप्त होने पर नया आवेदन करना अनिवार्य होगा। इसके अतिरिक्त, जहाजों को अपनी मर्जी से मार्ग बदलने की अनुमति नहीं होगी; उन्हें लारक द्वीप के समीप से गुजरने वाले ईरान द्वारा निर्धारित आधिकारिक रूट का ही अनुसरण करना होगा। तय मार्ग से हटने पर होने वाले किसी भी नुकसान या दंडात्मक कार्रवाई की पूरी जिम्मेदारी जहाज के कप्तान और मालिक की होगी। इस व्यवस्था के अंतर्गत जहाजों के लिए पीजीएसए से मान्यता प्राप्त बीमा होना भी आवश्यक कर दिया गया है। सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि आवेदन प्रक्रिया के दौरान जहाज मालिकों को एक घोषणा पत्र पर सहमति देनी होगी, जिसके तहत वे भविष्य में इस नियामक एजेंसी के किसी भी निर्णय को विधिक चुनौती नहीं दे सकेंगे।
शुरुआती रियायतें और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
द्विपक्षीय समझौते की शर्तों के अनुसार, पहले 60 दिनों की प्रारंभिक अवधि के दौरान जहाजों से नौवहन सहायता, सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और बीमा जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और इसका संपूर्ण वित्तीय भार ईरानी सरकार स्वयं वहन करेगी। हालांकि, यह कर-मुक्त सुविधा केवल अस्थायी है और ईरान ने भविष्य में इन सेवाओं पर भारी शुल्क लगाने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। भारत, जो अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है, सहित चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख वैश्विक उपभोक्ता इस नई व्यवस्था पर पैनी नजर रख रहे हैं। वर्तमान में भू-राजनीतिक तनाव कम होने से समुद्री यातायात सुचारू होने की उम्मीद तो जगी है, परंतु दूरगामी रूप से सख्त नियमों और भावी शुल्कों के कारण वैश्विक शिपिंग लागत में बढ़ोतरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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