क्या NDA में शामिल होगी DMK? स्टालिन को साथ लाने की अटकलें तेज
चेन्नई/नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों दक्षिण भारत का राज्य तमिलनाडु जबरदस्त चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इन राजनीतिक चर्चाओं के पीछे की सबसे पहली वजह तो वहां नवगठित 'विजय सरकार' है, जो सत्ता में आते ही लगातार ताबड़तोड़ फैसले ले रही है। वहीं दूसरी तरफ, राज्य की पूर्व सत्ताधारी पार्टी डीएमके (DMK) और उसके प्रमुख एम. के. स्टालिन को लेकर भी कयासों का बाजार बेहद गर्म है। राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें तेजी से चल रही हैं कि डीएमके आने वाले समय में केंद्र के सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा बन सकती है। हालांकि, इन अटकलों को लेकर अभी तक न तो बीजेपी और न ही डीएमके की तरफ से कोई आधिकारिक बयान आया है।
संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत और बीजेपी की नजर
यह राजनीतिक चर्चा ऐसे समय में उठी है जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को संसद में कई बड़े संवैधानिक और राजनीतिक प्रस्तावों को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की सख्त जरूरत महसूस हो रही है। हाल के महीनों में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण लागू करने तथा देश में नए परिसीमन (Delimitation) से जुड़े संविधान संशोधन बिल पर केंद्र सरकार को वैसा समर्थन नहीं मिल पाया जैसी उम्मीद थी, और लोकसभा में एनडीए जरूरी आंकड़े से थोड़ा पीछे रह गया था। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों के साथ नए रिश्ते बनाने की कोशिश कर रही है ताकि राज्यसभा और भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति में बड़े विधेयकों को आसानी से पास कराया जा सके और विपक्षी 'INDIA' गठबंधन को कमजोर किया जा सके।
तमिलनाडु के चुनावी नतीजों के बाद बदले समीकरण
तमिलनाडु में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद आए नतीजों ने इन अटकलों को और ज्यादा हवा दी है। इस चुनाव में लंबे समय से राज्य की सत्ता पर काबिज डीएमके को बड़ा झटका लगा और पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। चुनाव में हार के बाद एम. के. स्टालिन ने कमियों की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाई है और संगठन के भीतर नए सिरे से मंथन शुरू हो गया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसी बदले राजनीतिक माहौल के बीच अब बीजेपी और डीएमके के करीब आने की संभावनाओं को टटोला जा रहा है, ताकि दोनों दल अपने-अपने भविष्य के सियासी हितों को सुरक्षित कर सकें।
पुरानी वैचारिक दुश्मनी और गठबंधन की राह में चुनौतियां
भले ही राजनीतिक गलियारों में समझौते की खबरें तैर रही हों, लेकिन डीएमके को साथ लाना एनडीए के लिए इतना आसान भी नहीं माना जा रहा है। डीएमके लंबे समय से बीजेपी की प्रबल वैचारिक विरोधी रही है और स्टालिन ने परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र सरकार का खुलकर विरोध करते हुए आरोप लगाया था कि नए नियमों से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। इसके अलावा, तमिलनाडु में बीजेपी की पुरानी सहयोगी पार्टी एआईएडीएमके (AIADMK) पहले से ही मैदान में है। ऐसे में धुर विरोधी रही दोनों पार्टियों (बीजेपी-डीएमके) का सार्वजनिक रुख अब भी एक-दूसरे के खिलाफ ही दिख रहा है, जिससे इस संभावित गठबंधन की राह में कई बड़े पेच फंसे हुए हैं।

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