भारत का जोर सहमति आधारित निर्णय पर, पीयूष गोयल का बयान
नई दिल्ली। विश्व व्यापार संगठन में सुधार को लेकर भारत ने स्पष्ट और मजबूत रुख अपनाते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शी, समावेशी और सदस्य-आधारित होनी चाहिए, जिसमें विकासशील देशों के विशेष अधिकारों को केंद्र में रखा जाए। कैमरून में आयोजित डब्ल्यूटीए मंत्रिस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि संगठन के सुधार विकास-केंद्रित होने चाहिए और इनमें भेदभावरहित व सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि सभी सदस्य देशों के लिए समान अवसर सुनिश्चित हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि डब्ल्यूटीओ समझौतों में शामिल स्पेशल एंड डिफरेंशियल ट्रीटमेंट (S&DT) प्रावधान, जो विकासशील देशों को विशेष अधिकार देते हैं, उन्हें अधिक स्पष्ट, प्रभावी और व्यवहारिक बनाया जाना चाहिए। कृषि क्षेत्र पर बोलते हुए गोयल ने कहा कि यह करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए। उन्होंने खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण (पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग), विशेष सुरक्षा तंत्र और कपास से जुड़े लंबित मुद्दों के जल्द समाधान की मांग की। मत्स्य पालन (फिशरीज) के मुद्दे पर भारत ने संतुलित समझौते की वकालत करते हुए कहा कि यह गरीब मछुआरों की आजीविका की रक्षा करे और वर्तमान व भविष्य की जरूरतों के बीच संतुलन बनाए, साथ ही S&DT प्रावधानों को भी प्रभावी बनाए। गोयल ने डब्ल्यूटीओ के विवाद निपटान तंत्र को बहाल करने की जरूरत पर भी जोर दिया, इसे दुर्बल बताते हुए कहा कि इसके कमजोर होने से सदस्य देशों को न्याय पाने में कठिनाई हो रही है। इसके अलावा, उन्होंने प्लूरिलेटरल (बहुपक्षीय से इतर) समझौतों को WTO ढांचे में शामिल करने के लिए सर्वसम्मति को जरूरी बताया और कहा कि इससे गैर-भागीदार देशों के अधिकारों पर असर नहीं पड़ना चाहिए। ई-कॉमर्स पर कस्टम ड्यूटी में छूट (मोराटोरियम) के मुद्दे पर भी भारत ने सतर्क रुख अपनाते हुए कहा कि इसके प्रभावों को देखते हुए इसे आगे बढ़ाने पर पुनर्विचार जरूरी है। उभरती तकनीकों के संदर्भ में गोयल ने कहा कि भारत का मानना है कि इनका उपयोग ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए, ताकि विकास और नवाचार का लाभ सभी तक समान रूप से पहुंचे। उन्होंने अंत में कहा कि WTO को वैश्विक व्यापार व्यवस्था के केंद्र में बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सुधारों के जरिए इसे अधिक प्रभावी, समावेशी और विकासोन्मुख बनाया जाए, ताकि यह गरीब और कमजोर वर्गों के हितों की बेहतर तरीके से रक्षा कर सके।

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