मृत्यु के बाद या कल्पवास पूर्ण होने पर ही क्यों होता है शय्या दान? जानिए इस रहस्यमयी दान का आध्यात्मिक सच
तीर्थ में दान करना हमेशा से शुभ माना गया है, लेकिन प्रयागराज में माघ महीने के कल्पवास के समय किया गया दान खास माना जाता है. मान्यता है कि यहां किया गया दान कई गुना फल देता है. कल्पवासी पूरे महीने साधारण जीवन जीते हैं-जमीन पर सोना, सादा भोजन, संयम और भक्ति. इसी दौरान वे अपनी क्षमता के अनुसार दान भी करते हैं. आम तौर पर कल्पवास में गाय, घी, तिल, सोना, भूमि, वस्त्र, अन्न, गुड़, चांदी और नमक का दान बताया गया है. इसके अलावा वेणी दान, गुप्त दान और शय्या दान का भी विशेष महत्व माना जाता है. हर दान का अपना अलग उद्देश्य और धार्मिक भाव होता है.
शय्या का मतलब है सोने का बिस्तर-जैसे खाट, पलंग, गद्दा, चादर, तकिया आदि. जब ये चीजें धार्मिक भाव से दान की जाती हैं, उसे शय्या दान कहा जाता है. इसका सीधा भाव है कि दान देने वाला अपने आराम की वस्तु किसी और को समर्पित करता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दान आत्मा की शांति और पुण्य से जुड़ा माना जाता है. इसे त्याग और सेवा का प्रतीक भी समझा जाता है.

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